Monday, August 26, 2019

ज़िक्र

हाल कुछ इसलिए भी बुरा रहा
आपकी कहानी में ज़िक्र एक अधूरा रहा

मसख़रा बनकर हस्ते रहे ज़िंदगीभर
एक घांव जबसे बहोत ही गहरा रहा

क्या करता गिला-शिकवा तूफानोंसे फ़क़ीर
जिसकी लहरों पे हमेंशा सैलाबों का पहरा रहा

लूट नहीं पाए सारा ख़जाना वो जज्बात का
देखो एक फ़क़ीर तो मगर फिर भी पूरा का पूरा रहा

और क्या देता ख्वाबों की ताबीर खुदा भी उस मुंतज़िर को
यह हादसा भी देखो होता रोज-मर्रा रहा

फरिश्ता

Wrote This for Chester Bennington

फैला के तिलिस्म-ए-मुसर्रत जहाँ में
दर्द चीखता रहा कोई
फरिश्ता रहा दहर में
एक रोशन सितारा कोई 

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी  मुसलसल तूफानों की
हसीं दास्ताँ,
मगर फिर भी ज़िंदा रहने के यकीं
से है खस्ता 

मै

मंजिलों की गर्दिश में
भटकता आवारा हु मै
मंज़र-ए-सफर का
इस्तिआ'रा हु मै 

खला

आसमां के जैसा मुकद्दर है अपना शायद,
सितारों की महफ़िल तो है मगर फिर भी,
खाली है, खला है  

कोडं

विज्ञानाला सुटतं कोडं
पाऊस पडण्याचं
कवीला कळतं शल्य
आभाळ रडण्याचं 

मेहरबान

ये मोहब्बत हमपे क्या मेहेरबानी करेगी ?
हम खुद इसपे मेहरबान है
हम तो अपने मुखालिफ को भी गले से लगते है
ऐसा अपना रवैय्या है, ऐसी अपनी पहचान है  

मशहूर

कुछ इस कदर रहते है
के हर किसी के हिस्से में नहीं आते
मशहूर इसीलिए है आजकल
के किसीके किस्से में नहीं आते 

ईबादत

क्यों न गिला करता
तेरी खुदाई से फ़क़ीर
के हर एक हर्फ़ ने
ईबादत से इनकार किया हैं  

ईद

ईद पे दीदार होता था कभी
किसीको गले लगाए अर्सा बीत गया... 

भेट

सूर्य चंद्र मावळतो तिथे व्हावी आपली भेट एका हृदयांतल बोलणं दुसऱ्या हृदयाशी थेट