हाल कुछ इसलिए भी बुरा रहा
आपकी कहानी में ज़िक्र एक अधूरा रहा
मसख़रा बनकर हस्ते रहे ज़िंदगीभर
एक घांव जबसे बहोत ही गहरा रहा
क्या करता गिला-शिकवा तूफानोंसे फ़क़ीर
जिसकी लहरों पे हमेंशा सैलाबों का पहरा रहा
लूट नहीं पाए सारा ख़जाना वो जज्बात का
देखो एक फ़क़ीर तो मगर फिर भी पूरा का पूरा रहा
और क्या देता ख्वाबों की ताबीर खुदा भी उस मुंतज़िर को
यह हादसा भी देखो होता रोज-मर्रा रहा
आपकी कहानी में ज़िक्र एक अधूरा रहा
मसख़रा बनकर हस्ते रहे ज़िंदगीभर
एक घांव जबसे बहोत ही गहरा रहा
क्या करता गिला-शिकवा तूफानोंसे फ़क़ीर
जिसकी लहरों पे हमेंशा सैलाबों का पहरा रहा
लूट नहीं पाए सारा ख़जाना वो जज्बात का
देखो एक फ़क़ीर तो मगर फिर भी पूरा का पूरा रहा
और क्या देता ख्वाबों की ताबीर खुदा भी उस मुंतज़िर को
यह हादसा भी देखो होता रोज-मर्रा रहा
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