Sunday, August 12, 2018

तआरुफ़

खुद से खुद का ही
तआरुफ़ न हो पाया।
दरगाह मे था फकीर
रातभर न सो पाया।

आफताब

बच्चा जो सिरहाने
लिये ख्वाब सोता है।
अनजान रेहता है के
खुद् एक आफताब होता है।

Sunday, August 5, 2018

आठवण

शोधत राहीन अवकाश,
मज गवसत नाही गाणी,
ताऱ्यांत हरवली माझी
गझल जुनी पुराणी...

भेट

सूर्य चंद्र मावळतो तिथे व्हावी आपली भेट एका हृदयांतल बोलणं दुसऱ्या हृदयाशी थेट